विकास की व्यार आखिरी जन तक होगी,
असमझस में हूँ उसकी पहचान कब तक होगी।

यहाँ तो मलाई खा रहे सरकारी नौकर जड़ तक,
कामचोरों पर कार्रवाही जनाव कब तक होगी।

अधिकारी भी सहमे सहमे लाचार हमने देखे यहाँ,
चतुर्थ तृतिय श्रेणी पर कार्रवाही कब तक होगी।

बना रखा है नौकरी को घूस का मसीहा जिन्होंने,
उस रावण की लंका न जाने तवाह कब तक होगी ।

दर दर छाना हमने सब ओर मनमानी भारी है,
मनमानी की नानी को सजा कब तक होगी।

जाग कर नाटक सोने का, जब तक होगा जग्गू,
जमीन पर कालिख ही कालिख तब तक होगी।
जग्गू नोरिया