दाता कुछ समझ न आये/पंडित अनिल

दाता कुछ समझ न आये “

मस्त सुरों में कोयल कूँकें, कागा शोर मचाये।
मेंहदी के पत्तों में लाली, पिसते ही आ जाये ।।

सूर्यदेव बरसाते अगनी, मामा चाँद कहाये ।
गन्ने से गुड़ चीनी निकले, घी दधि दूध समाये।।

इत्तर लकड़ी फूल से निकले,गली गली महकाये।
रोशन दीप करे जलते ही,बुझे जोत कहाँ जाये।।

जुगनू जगमग करे ऊलूका,रैन सकल दरशाये।
आसमान नीला काला कभी,सतरंगी हो जाये।।

कच्चे फल खट्टे लगते , पकते मीठे हो जायें ।
माँ के पेट अंध कूप में , बालक तैर लगाये ।।

कुंजर सिंह महा बलशाली, चींटी निबल हो जाये।
खाट में मानव पड़ा काठ सा कैसे,शीत कहाये।।

तूँ ऊपर बैठा मुस्काये , सबको नाच नचाये ।
पानी नीचे ज्वाला डाली, जो हर अगन बुझाये ।।

कोई राजा कर्मवान, ढिंढोरा छत पिटवाये ।
कोई हर पल करे चाकरी, भूखा ही सो जाये ।।

मच्छर जोंक ख़ून थन चूसे , बूँद दूध ना पाये।
टरता नहीँ करमगति टारे, दाता समझ न आये।।

चींटी रस चूसे मिट्टी से,भारी बोझ उठाये ।
मोर हुआ बनचारी दाता,ब्रह्मचारी कहलाये।।

बेर के उलटे सीधे काँटे, ले सबको उलझाये।
नदियाँ जल मीठी बहती, सागर जा ख़ार हो जाये।।

मकड़ी थके न जाले बुनते,हंस विवेक जगाये।
मधुमख्खी सेठानी मधु की,लेकिन बूँद न पाये।।

माया तुम्हरी दासी,पर मानव को ठगती जाये।
गज मस्तक मुक्ता, विषधर में मणि कैसे बन जाये।।

सर्प का तन बिन कान का सरगम, सुनता फन फैलाये।
माया मालिक समझ न आये,माथ अनिल चकराये।।

” दाता कुछ समझ न आये ”

पं अनिल

अहमदनगर महाराष्ट्र

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