धुन्ध गहरा रही है/सूबे सिंह सुजान

धुन्ध गहरा रही है
धुन्ध गहरा रही है उसको उतर जाने दो
सबको मरना है यहाँ,उसको भी मर जाने दो ।

क़त्ल करती है तरक्की भी बहुत लोगों के
थोड़ा परहेज करो,जख़्मों को भर जाने दो ।

इतने सूरज न बनाओ कि तुम्हीं जल जाओ
यूँ करो फूल उगाओ,और बिखर जाने दो ।

ऐ बुरे लोगो जरा बचके रहो अच्छों से
ये जिधर जायें,बस इनको तो उधर जाने दो ।

रोती तन्हाई तेरे पास आ बैठी है “सुजान”
इसको सहलाओ, कहो वक़्त गुजर जाने दो ।

सूबे सिंह सुजान

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