क्या खूव तर्क है ,
सोच सोच में फर्क है,
शासक उलझे कुर्सी देख
जनता का बेड़ा गर्क है,
गाड़ी गिर जाती बहाँ,
सीधी सीधी सड़क है,
गुनाहों से बाज नहीं,
सजा पर कहते रड़क है,
लाख कोशिशें सवूत नहीं,
नेताओं से गूढ सम्पर्क है,
चिन्ता करते मर जायेंगे,
पड़ना नहीं कहीं फर्क है ,
गला फाड़ हुई दलीलें ,
सुन न्याय शुरू तर्क है,
बच जाते देशद्रोही यहाँ,
लोक नहीं जब सतर्क हैं,
फिर भी देश चल रहा है,
शासक नर्म या कड़क है।।
जग्गू नोरिया