सीमाओं में रहकर/डा प्रत्यूष गुलेरी

सीमाएं
डा प्रत्यूष गुलेरी

सीमाओं में रहकर
जिंदगी आसान है
सीमाएं देश की हों
भले घर परिवार अथवा
मुंह की जवान की
टूटती हैं तो भूचाल निश्चित है
नदियों,पर्वतों और समुद्रों की
सीमाएं टूटने पर कोहराम मचता है
सबने देखा है
चीखों-चीत्कारों के भयावह नजारों का सच
सपनों में हकीकत में
सृष्टि के सर्वनाश का यथार्थ है
सीमाओं को सीमाओं में रखकर
सब सुखकर अहंकार दुखकर
जिंदगी जीने का का यही फंडा
सोने की मुर्गी का
सोने का अंडा अथवा मूल मंत्र!!

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