क्या हसी रात है/लक्ष्मण दावानी

212 212 212 212
क्या हसी रात है चाँद भी साथ है
अब कहाँ बस में मेरे ये जज्बात है

लेके हाथो में वो हाथ मेरा चला
मुद्दतो बाद वो हम सफ़र साथ है

शर्म से छुप गया चाँद बदली में जा
देख जवां दो दिलो की ये बारात है

जल उठे दो बदन रातें हुई जवां
हुस्न ओ इश्क की ये मुलाकात है

रख दिये लब लबो पर मेरे उसने यूँ
बढ़ गयी तिश्नगी वाह क्या बात है

देख मिलन ये जवां दो दिलो का यहाँ
चाँदनी ने की फूलों की ये बरसात है

अरसे के बाद बिखरी यूँ है चाँदनी
चाँदनी के संग वो खुशनुमा रात है
( लक्ष्मण दावानी )

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