शहीदों को नमन विजय दिवस / आशीष बहल 

शहीदों को नमन 

कोई बताये मुझे कि ये मिटटी की महक क्या होती है, क्यों मिलती नही किसी को जमीं ए वतन और परिंदों की मलकियत आस्मां पे होती है, कौन है जो लौट के घर नहीं आया क्यों दरवाजे पे आज भी दीदार ए नज़र होती है

ए खुदा बता मुझे वतन पर कुर्बान होने वालों की जिद क्या होती है, मदमस्त इन वीरों को खुदा तू भी क्या जाने , मेरे देश के इन सपूतों की तो शान निराली होती है, मेरे देश के इन सपूतों की तो शान निराली होती है,
लिपट कर तिरंगे में बड़ी शान से आते है, हर वक्त हथेली पे इनके जान होती है, होते होंगे वतन को बेचने वाले कोई खुदगर्ज मेरे सैनिको से तो देश की ऊँची शान होती है, देश के सपूतों की तो सरहद पर ईद,और दिवाली होती है, मेरे देश के वीरों की शान निराली होती है, मेरे देश के वीरों की शान निराली होती है।

कह दो हवाओं से कि पैगाम उन तक पँहुचा देना , देश के गद्दारो को जरा समझा देना हर बार नहीं क्षमा यंहा स्वीकार होती है,
कोशिश तू लाख कर ले हिंदुस्तान की हस्ती न खाक होती है, बन हिमालय खड़ा सिपाही इसी से तो तिरंगे की पहचान होती है, मेरे देश के शहीदों की शान निराली होती है, मेरे देश के शहीदों की शान निराली होती है।

आशीष बहल

चुवाड़ी जिला चम्बा

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