हे मेरे करतार/पंडित अनिल 

हे मेरे करतार ”

सुजन गर रूठ जाये तो, करो मनुहार बारंबार।
सजन के द्वार जाना है, बहुत गहरी नदी की धार।।
जानें कौन लीलाधर की, लीला ही है अपरंपार।
सजन के • • •

कभी सोचा नहीं जाना, रहा हर ग़म से अंजाना।
दीया,मद्धम हुआ साँसों का,हिलने लागा तन ताना।।
सवारी को रहो तैयार, मरम्मत कर भी लो पतवार।
सजन के द्वार • • •

कभी ग़र्दिश रहा,तो थी कभी अँधियारी सी दुनिया।
बड़ी रंगीन सी दुनिया, बड़ी प्यारी लगे दुनिया।।
चलो चलना है रंगे महल को, कर लो जरा श्रृंगार।
सजन के •••••

बना खुदगर्ज ये माना, कभी दिन रात ना जाना।।
यहाँ रिश्ते भी रखे ताख पे,धुन धन का दीवाना।
हुआ दिल चाक तुनें दिन,दिखा दी हे मेरे करतार।
सजन के द्वार • • • •

किरन डूबे हो जाये शाम,जीवन की हे बनवारी।
मेरा कर थाम लेना, नाम की चढ़ जाये खुमारी।।
तुम्हीं माझी अनिल की नाँव, कर देना प्रभू जी पार।
सजन के द्वार • • • • •

पं अनिल

अहमद

नगर महाराष्ट्र

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