चार दिनों की जिन्दगी/हेमन्त पांडेय

चार दिनों की जिन्दगी में हम यूँ ही लड़े जा रहे थे |
किसी को अपना किसी को पराया कहे जा रहे थे |
नज़र अपनी ही थी देखने की हर शख़्स को मगर
दोष अपने छुपाकर दोषारोपण दूसरों पर किये जा रहे थे ||

अपना दुःख तो कुछ था ही नहीं , जहाँ में मगर
दूसरों के सुखों से अक्सर हम दुःखी हुए जा रहे थे |
घमंड हर बात में उसी का हम किये जा रहे थे
पता तो तब चला जब खाली हाथ जहाँ से स्वयं जा रहे थे ||

दिख रहा था नज़ारा मरने के बाद भी मुझे
अपनी समझ से सभी हमे अच्छा – बुरा कहे जा रहे थे |
मैं था अकेला अपने जीवन के अंतिम सफर पर
अपने संग सिर्फ हम अपने कर्मों को लिए जा रहे थे ||

ज्ञानमयी दृष्टि से जग को निहारे जा रहे थे
सभी प्राणी में उसी राम को हम पाये जा रहे थे |
सीख जिन्दगी से सिर्फ हम इतना जा रहे थे
मानवता ही जीवन है आखरी क्षणों में कहे जा रहे थे
चार दिनों की जिंदगी में हम यूँ ही लड़े जा रहे थे ||

कवि – हेमन्त पाण्डेय ( अमेठी )
9082749767 / 9151405600

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