कहर/पंडित अनिल

कहर

शब्द के काटे हुवे, कभी ज़ख़्म भर पाये नहीं।
दौलत वाले द्वार दुखियों के, कभी आये नहीं।।

खो गये कुछ लोग महलों पे महल, की होड़ में।
कर दिये लंगड़े बहुत को, शान के ही दौड़ में।।
जब लगे थकने हैं कहते, मिलन कर पाये नहीं।
शब्द • • • •

छोड़ दे,दो रंग जीना, इस फ़रेबी चाल को।
कौन जा पाया है लेकर, इस धरा के माल को।।
कुछ कमाई नेक कर जो ,यम कहर ढाये नहीं।।
शब्द • • •

धर्म करने को भी दौलत, चाहिये ये है सही।
लेकिन कहीं होते हैं, कर्मों के भी तो खाते बही।।
सामना हो रब से तो, ये मुखड़ा शर्माये नहीं।।
शब्द • • •

ख़्वाहिशों का समद, सुखा है नहीं संसार में।
सौदा हो जाये खरा,इस रंग के बाजार में।।
दीप सो जाये,सफ़र ये प्राण कर जाये नहीं
शब्द के काटे हुवे • • •

पं अनिल

अहमदनगर महाराष्ट्र

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