खाब आंखों को/लक्ष्मण दावानी

खाब आंखों को झूठे यार दिखाते क्यूँ हो
रात भर खाब में तुम आके जगाते क्यूँ हो

गाते हो नग्मे मुहब्बत के मेरी जब तुम
फिर ये जज्बात मेरे ही से छुपाते क्यूँ हो

आये हो वस्ल कि चाहत लियें दिल मे यारा
आके नजदीक मेरे फिर युँ लजाते क्यूँ हो

हर कदम साथ निभायेंगे मुहब्बत में हम
तुम कदम राहें मुहब्बत से हटाते क्यूँ हो

कर न अब और सितम दिलपे मेरे तू जाना
हिज्र- ए -गम में मुझे अपने रुलाते क्यूँ हो

इश्क की जात पे गर शक ओ शुबा है तुम्हे
ज़िन्दगी दांव पे तुम यार लगाते क्यूँ हो

फर्क पड़ता हि नही दर्द से मेरे तुम्हें
अश्क फिर आंख से अपने ये बहाते क्यूँ हो
( लक्ष्मण दावानी ✍ )

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