ग़ज़ल*
अक्सर आदत हैं मेरी सब कुछ भूल जाने की
बात की न गले लगे जल्दी क्या थी यूँ जाने की।

तेरी चौखट पे मैंने अपना दर्दे दिल बिछा दिया
हिम्मत कहां थी मुझमें एक और चोट खाने की।

फिरते रहे हमेशा हम सैलाव लिये जख्मों का
थोडी़ सी कोशिश की है तेरे लिये मुस्कराने की।

होती नहीं बर्दाश्त अब नफरत यूँ हमसायों की
चाहत को यूँ नज़र लगी कयूँ जमाने की ।

ऐ शमा तू जल जल कर खुद ही बुझ जाया कर
कुछ तो लम्वी हो जाये उमर अब परवाने की।

कभी तो पिलाई होती अपने लवों से तूने साकी
हम भी रौनक हो जाते यार तेरे मयखाने की।

बागों की सारी कलियाँ मसली न जातीं गर
भंवरे न भूल पाते अपनी आदत गुनगुनाने की।

पैगाम देकर चाहत का कोई दर्द दे गया
समझी तो होती हालत उसने इस दीवाने की।

बड़ी थी तमन्ना कोई अपना भी हो जाता
सोचा किया हरदम तेरी आँखों में डूव जाने की।

बो रेत के घरोंदे जो बनाये थे सागर किनारे
भूल करते न कभी भी जा समन्दर में समाने की।

मेरी चाहत का तुमको हो जाता जो कभी भरोसा
सोचतीं न तुम कभी इस तरह मुझे भुलाने की।

चाह थी हमारी हमें चंदन से ही जलाया जाये
वो करते रहे कोशिश बस हमें दफनाने की।

यह दर्द की इँत्हा झेली जाती नहीं अब मुझसे
ले चल मुझे तूं वापिस नहीं चाह इस वीराने की।

इन उदासियों में मेरा अब दम घुटने लगा है
तूनें भी सोच रखी है मुझ पर जुल्म ढाने की।

निराश यह परछाईयाँ कभी हाथ नहीं आतीं
कोशिश मत किया कर इन्हें अपना बनाने की।

सुरेश भारद्वाज निराश
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