कोन कहता किस के बारे ,हो सकता असर करता है।
करता जब जब आलोचना कोई मेरी, सच में कदर करता है।।

किसी में हिम्मत नहीं कि कम कर सके चमक तुम्हारी।
जो कुछ होता रहा प्रयास,देखा साफ ड़गर करता है।।

लेखक मिलते हैं एक पत्थर के नीचे हजारों वेशक।
कुछ नहीं उसके आगे वोह, जो पढ़कर कदर करता है।।

सब के मन में तमन्ना रहती कि सराहना हो उनकी ।
लेकिन गुमनाम बैठा है वोह,निन्दा पर भी सब्र करता है।।

अलफाज़ कहने से पहले उम्मीद वाह वाह सुनने की होती।
उसका काफ़िला वाह वाह में,जग्गू वसर करता है।।