रौशनीं आई/पंडित अनिल

रौशनीं आई

तुम जो आये ,चराग़ों में,रोशनी आई ।
खिल गये गुल यूँ बगाँ में,ताज़गी छाई।।

चूर हो जाता है शीशा-ए-दिल अक्सर।
दिल को भाती है कहाँ नींगोड़ी तन्हाई।।

पीर पर्बत सी लगी ही,है हमेशा हमको ।
की है जब भी तुमने बेरुख़ी सी रूसवाई।।

बन गया मयख़्वार कोई बेख़ुदी में ऐसे।
मुझपे बिन पिये ही ,है ख़ुमारी सी छाई ।।

ज़िंदगी क्यूँ है घुँटन में ऐसे क्या जीना ।
बेवफा़ है ये कहाँ वफा़ई, निभा पाई।।

नेंमतें हर पल बरसती हैं फलक से देख ।
क्या पता किस वक्त वो कर जाये सगाई।।

आँखों में ज़िंदे से खाब रखना जरा अनिल।
क्या पता कब नींद सी,आ जाये ख़ुदाई ।।

पं अनिल
अहमदनगर महाराष्ट्र
स्वरचित अप्रकाशित
8968361211

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