जब जन्म हुआ मेरा/हेमन्त पांडेय

जब जन्म हुआ मेरा खुशी पूरे घर में थी
समय बीतता गया मैं बढ़ती रही ,
घर से स्कूल तक का सफर खुशी से तय करती रही |

कभी अकेले तो कभी सहेलियों के संग में
मैं बचपन के हर रंग में ढलती रही |

तभी इक नया पड़ाव आया मेरी जिंदगी में
मैं बचपन को छोड़ कर यौवन में प्रवेश करती रही |

एक नयापन था मेरी जिंदगी में
मैं स्वयं को स्वयं ही में समझती रही |

अपने माँ और पिता को मेरी शादी की
बातें करते अक्सर में सुनती रही
बचे कुछ वक्त अपनी जिंदगी के
अपनों के साथ प्रेम से बिताती रही |

आया एक दिन मेरी लग्न का उस वक्त
परिवार के संग मैं भी खुशियां मनाती रही |

विवाह को हुए मेरे कुछ वक्त ही बीते थे
दहेज़ के नाम पर धमकियां मेरे
घर को हर रोज जाती रही |

मेरे माँ – बाप ने खुद को और घर की छत
छोड़ कर अपना सबकुछ दे दिया इन्हें
फिरभी दहेज के इन लालची लोगों
की भूख दिन प्रतिदिन बढ़ती रही |

इक दिन मेरे ऊपर भी जुल्म हुआ और
मैं दहेज की पीड़ा से हर वक्त पीड़ित होती रही |

कभी याद कर बीते अच्छे पलों को मैं हँसती
कभी आज को सोचकर अपने आँखों से
गिरते हुए आसुओं को देखती रही |

खामोसी से भरे थे हर प्रश्न मेरे
और मैं खुशी के उत्तर हर दिन तलासती रही |

टूट गई मैं अकेली होकर, और
सीता सी अपनी लंका मे
हर रोज इक नयी अग्नि परीक्षा देती रही |

साबित कुछ न हुआ मेरी मौत के सिवा
और मैं अबतक मौत से भी बत्तर जिंदगी जीती रही |

खत्म हुआ मेरी जिंदगी का सफर मेरे साथ ही
और मैं अपनी हर साँस से इन्हें पापी कहती रही |
दहेज प्रथा की बीमारी से त्रस्त होकर
इसे लाने वालो को मैं बद्दुआएं देती रही |

न जाने ऐसी कितनी लड़कियों की हो रही है दुर्गति ,
मैं अपनी नहीं अपनी जैसी हर लड़की की दास्ताँ
सुनाती रही |

दहेज प्रथा की बीमारी को खत्म करो
अपनी आखरी साँस से अपनी आखरी आवाज
में यही कहती रही |

कवि – हेमन्त पाण्डेय ( अमेठी )
9082747967

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