कविता*
अन्दर ही अन्दर जल रहा था मैं,
बाहर जल रही थी बस्ती,
कदम कदम पर ठोकरें थीं
बूंद बूंद मिट रही थी मेरी हस्ती,
अबिरल बह रही थी धारा आँखों से,
श्बास श्बास जी रहा था मै,
टूटती हुई बुझी बुझी सांसों से,
जिन्दगी का रस पी रहा था मै,
मौत की परछाई,
जीवन पर पड़ने लगी थी
होंठ अपने सी रहा था मै
असहनीय पीड़ा शूल बनकर,
सीने में गढ़ने लगी थी।
कदम दर कदम वो
मेरी ओर बढ़ने लगी थी
आँखों का बोझिलपन,
तोड़ रहा था तन बदन,
गहरी उन्नीदी आँखें,
टूटता हुआ वयाकुल मन,
दिल में टीस सी उठती हुई,
दर्द की झंकार चुभती हुई,
अन्तिम प्रहर की बेदना,
फीकी पढ़ती चेतना,
लौट जाने की चाहत,
दर्द से कुछ राहत,
मिट जाने का अहसास,
लुट जाने का त्रास
चेहरे की मुस्कान,
जीने की पहचान,
जख्मों का सैलाब,
जिन्दगी का बहाब,
मौत की ओर,
बस सिर्फ मौत की ओर।।

सुरेश भारद्वाज निराश
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