आता है बाजार नजर , आँखों के चहुँओर अब
खिलौने से बिकने लगे रिस्ते आँखों के चहुँओर अब
स्वार्थ से मिलते – मिलाते नजर आते है लोग अब
इंसानियत स्वयं ही परेशान इंसानों के चहुँओर अब
आता है बाजार नजर , आँखों के चहुँओर अब |

फिसल रही है जिंदगी , मगर बेख़बर हैं लोग अब
मौत हैं निश्चित , मगर जिंदगी जीते नहीं है लोग अब
मानवता को भुला कर करते हैं भेद-भाव अब
यही तो दुःख है कि मानवता का हनन हो रहा चहुँओर अब
आता है बाजार नजर , आँखों के चहुँओर अब |

भ्रूणहत्या से न जाने क्या पाते हैं लोग अब
आती हुई लक्ष्मी ( बेटी ) को ठुकरा देते हैं लोग अब
दहेज़ प्रथा के नाम पर ठगते है कुछ लोग अब
उन्हें मालूम नहीं अपने बेटे की कीमत लगाते चहुँओर अब
आता है बाजार नजर आँखों के चहुँओर अब |

बदलती अपनी फितरत से खुश होते हैं लोग अब
दूसरों के सुखों में लगा आग खुद को सुखी पाते है लोग अब
सोचता है हेमन्त कितने बदल गए ये लोग अब
झूठे सुखों की चाह में दुखों से घिरे चहुँ और अब
आता है बाजार नजर आँखों के चहुँओर अब |

कवि – हेमन्त पाण्डेय (अमेठी )