सूखे दरख़्त भी/पंडित अनिल

यक़ीन

सूखे दरख़्त भी , होते हरा देखा ।
बिना ख़ंजर के , वार गहरा देखा ।।

मैं सुनाता रहा, दर्द-ए-दिल दास्ताँ ।
मगर उस हाक़िम को,बहरा देखा ।।

यक़ीन रखिये,आसां नहीं है इम्तिहां ।
इश्क़ पे हरदम कड़ा , पहरा देखा ।।

यूँ ही नहीं यहाँ होता, मुरीद कोई।
नूर-ए-मुर्शिद , हमने चेहरा देखा।।

बहुत सुकून है रज़ा में,उसके अनिल।
दर पे उसके दर्द नहीं , ठहरा देखा ।।

पं अनिल

अहमदनगर महाराष्ट्र

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