ग़ज़ल

यूँ तो हर साँस जी रहा हूँ मैं
बस कभी ख़ुद से खफ़ा हूँ मैं।
देखकर मुझको डर गई हो, क्या
इस क़दर खून से सना हूँ मैं।
क्या ख़बर सामने वो आ जायें
हर सुबह शाम देखता हूँ मैं।
क्यूँ ये अल्फ़ाज़ ठहरे ठहरे हैं
ज़िन्दगी इतना थक चुका हूँ मैं।
बेवजह याद कर रही हो, अब
इस जहाँ का कहाँ रहा हूँ मैं।
-राकेश पत्थरिया

कविता

वो जो आते हैं तुम्हारे सामने
वो जो रखते हैं पहचान
धर्म से जात-पात से
वो जो विरोध को दे देते हैं
राष्ट्रद्रोह का नाम/
वो जो दिखते हैं अकसर झुण्ड में
तुम्हारे गली- मुहल्ले में
वो जो हकीकत से डरे हुए हैं
तर्क वितर्क की नहीं
वो बात करते हैं मंगल, बुध, शनि की
गौर से देखो!
वो इन्सान हैं या कुछ और ?
-राकेश पत्थरिया