हम जिसे अपना बनाते रहे
वो पल-पल हमे ठुकराते रहे
गिरते रहे आँख से आंसू
वो हंस कर मजाक उड़ाते रहे
हम जिसे अपना…….

हम ने तो सह लिया हर
जख़्म तन्हाई का
उन्हें न कोई फर्क रुस्वाई का
समझा हम सफर उन्हें अपना
ज़ख्मो पर तलवार वो चलाते रहे
हम जिसे अपना ………

चाहा जिसे खुद से भी ज्यादा
दुनिया उन्हें अपनी हम बनाते रहे
डाल कर हुस्न का पर्दा मुँह पर मेरे दिल को मेरे वो जलाते रहे
हम जिसे अपना …….

हो चुकी थी इंतहा
मेरी भी मोहोबत की
न था कोई फरेब
न थी आरजू शोहरत की
दिल ही दिल मैं अपनाते रहे
हम जिसे अपना……