नींव का पत्थर/पंडित आनिल

नींव का पत्थर

काश कभी नींव के , पत्थर का भी ज़िकर होता।
इमारत की बुलंदी, फ़िर और भी बेहतर होता।।

हर शै है तो गुनहगार , थोड़ा -थोड़ा ।
नहीं तो यहाँ और भी ,हँसी मंज़र होता।।

हम गले मिलते रहे , कटते रहे तिल तिल।
कौन मिलता , अगर हाथ में ख़ंजर होता।।

छीन कर ख़जानें , दीन कर दिया उसको ।
इतना प्यारा बिचारा, ख़ारा नहीं समंदर होता।।

ताउमर करता रहा , घर की तिमारदारी।
अब आनिल कोई तो, रहबरा-ए-फ़िकर होता।।

पं अनिल
अहमदनगर महाराष्ट्र

One comment

  1. क्या बात है
    ताउमर करता रहा , घर की तिमारदारी।
    अब आनिल कोई तो, रहबरा-ए-फ़िकर होता।।

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