साभार अग्रज के प्रति)
पीयूष हैं गुलेर गांव से, कृष्ण गोपाल का उपनाम।
पं श्री कीर्ति धर व सत्यवती की हैं वे प्रथम संतान।
गुरु सोमनाथ सोम के प्रिय शिष्य ने, उनसे जीवन में बहुत कुछ पाया।
हिंदी क्षेत्र के प्रथम सोपान थे वे, उन्हीं से पीयूष उपनाम है पाया।
ईश्वर से अरदास है, उन्हें दे स्वास्थ्य और दीर्घायु का वरदान।
हम सब भाई बहनों की मात्र उन्हीं से है पहचान।
अग्रज के पदचिन्हों पर चलते हुए, पहुंचे वहां जो मिला है आज स्थान।
पीयूष के कंधों पर बैठकर, कोशिश की जीवन सागर तरने की।
साथ साथ चलते हुए, कंधे से कंधा मिला कोशिश की बढ़ने की।
गुलेरी जी पर शोध कार्य कर, पूर्वजों का कर्ज चुकाया।
अपने अनुज भाई बहनों को, सुपथ पर लाने का फर्ज निभाया।
पीयूष मात्र कृष्ण गोपाल ही नहीं, वे तो हैं हम सबकी जान और प्राण।
उनके बिना हम सब मात्र हैं, निर्जीव और निष्प्राण।
सबको सुपथ पर चलाने का, कार्य भार था उनके ही कंधों पर।
हम कहां तक सफल हुए जीवन में, यह तो पीयूष ही सकता जान।
अपने गांव गुलेर से आज भी, पीयूष तन्मयता से जुड़े हुए हैं।
भले ही रहें धर्मशाला (चीलगाड़ी) में, मन से गुलेर ही रमे हुए हैं।
गुलेर वासियों को भी फक्र है, पीयूष गुलेरी पर।
सब उन सम आगे बढ़ने को आज भी हैं तत्पर।
पीयूष यूं ही नहीं बना पीयूष, वह तो सबके मन को भाया।
खुद पीता गरल़ और दूसरों को उसने पीयूष (अमृत) पिलाया।
परिमल उपनाम दिया अग्रज ने, अबतक मैं कुछ लिख न पाया।
इक्हत्तर की वय में कविता रचकर, अग्रज का है कर्ज उतराया।।
नंदकिशोर परिमल, सेवा निवृत्त प्रधानाचार्य
सत्कीर्ति निकेतन, गांव व डा. गुलेर।
तहसील, देहरा, जिला, कांगड़ा (हि_प्र)
पिन कोड 176033, संपर्क 9418187358