हम तराशे गये ना संभाले गये
आये हाथो में जिनके उछाले गये

मुख़्तसर ही रही खुशियाँ बस मेरी
खेल किस्मत के मेरी निराले गये

रन्ज ओ गम करें तो करें कैसे हम
आँख से आँसु भी ना निकाले गये

अंधेरो में गुजर जायेगी ज़िन्दगी
तुम गये साथ तेरे उजाले गये

रंग जो प्रीत का मुझ पे तेरी चढ़ा
ना किसी और के फिर हवाले गये

मैं भटकता रहा दर बदर प्यास से
हाथ जो आये मेरे निवाले गये
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
12/6/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )