ग़ज़ल

उसने मांगीं जो दुआएं, का असर होने को है I
रास्ता तो था कठिन, पूरा सफ़र होने को है II

देखना है उस का जलवा घंटियां जो सुन रहा,
मेरा भी कुर्बान उस पत्थर पे सर होने को है II

बिजली पानी हो मयस्सर सड़क हो इल्म-ओ-शिफ़ा ,
गाँव मेरा शहर जल्दी ही अगर होने को है I

पैसा ही तो है नहीं सब, ढूढ़ कुछ तो प्यार में,
पत्थरों का है मकाँ जो गोया घर होने को है I

कट चुकी है रात काली हौसला तो रख जरा ,
अब परिन्दे भी तो बोले हैं सहर होने को है I

जान-ए-जाँ मेरी वफ़ा को भी जफ़ा कहते रहे ,
ऐसा लगता है कि किस्सा मुख्तसर होने को है I

बूँद स्वाती की गिरे, कुदरत है करती करिश्मा ,
वक्त आए फिर तभी तो वह गुहर होने को है I

भागने को है खिजाँ आतुर फिज़ा बासंती में ,
फूल पत्तों से लदा फिर यह शजर होने को है I

बाढ़ गर्मी बर्फ़ बेहद तेरे ‘कंवर’ कर्म हैं ,
कहर कुदरत का अभी तो और मगर होने को है I

कंवर करतार
‘शैल निकेत ‘ अप्पर बड़ोल
धर्मशाला हि. प्र.
9418185485