केवल माँ

बहुत ही याद आता है , दुबक कर गोद में सोना ।
कभी बिन बात के हँसना,कभी बिन बात के रोना।।
कभी गिर चोट दिखलाना, फ़िर माँ तेरा सहलाना।
हक़ीमी क्या रही तेरी,पहाड़ों दु:ख में मुस्काना।।

ये केवल कर सके नारी , दरिंदे कहते बेचारी।
तेरी दुनिया में भगवन रूप ,तेरा माँ में आ जाना।।
हुआ क्या बन दरिंदा घूमें है ,इंसान क्यूँ अबका।
जनम कर नारी से नर नें,ना नारी को है पहचाना।।

तूँ लोरी गुनगुनाई माँ , मुझे फिर नींद आई माँ।
कहीं दौड़ूँ कहीं भागूँ, ,तेरे आँचल में छिप जाना।।
अलौकिक सुख ये पाकर के,भी वहशीपन नहीं छोड़ा।
क्या दनुजों के लिये फिर होगा, काली रूप में आना।।

विरानापन रहेगा जब यहाँ , होगी नहीं नारी ।
बंजर सी धरा होगी , रहेगा टीस पछताना ।।
नराधम का ये फल होगा, नहीं देवों से हल होगा।
सहन क्यों,लाजमी है,चंडिका का, रूप धर जाना।।

पं अनिल
अहमदनगर महाराष्ट्र