महमान की महिमा/नंद किशोर परिमल

महमान की महिमा)
बिन तिथि बिन समय बतलाए, घर में आए जो व्यक्ति अनजान।
वही कहलाता और वास्तव में होता, वही व्यक्ति घर का महमान।
पांवड़े बिछा कर आदर करें उनका, और लुटा दें उन पर पूरा सम्मान।
भगवान् सम आदर करें उन सब का, यही है होती आतिथ्य की पहचान।
भगवान् के बच्चे खुश हो जाते, घर में आया देख नया महमान।
क्योंकि आज बनेंगे अनेकों व्यंजन, और बनेंगे सुंदर पकवान।
बच्चे ईश्वर का प्रतीक हैं होते, दिल से करें महमान की पहचान।
घर में प्रतिदिन महमान रहें आते, बच्चों का होता यही इक अरमान।
कुछ लोग नाक, मुंह, भौं सिकोड़ें, देख आया घर में नया महमान।
देख व्यवहार यह आगंतुक उनका, मन ही मन मानें बड़ा अपमान।
एक बार वहां वह आकर, दोबारा वहां जाने का नहीं लेता कभी नाम।
सभ्यता संस्कृति हमारी नहीं सिखलाती, कभी भी करना ऐसा काम।
दिल से सम्मान करें हम उन सबका, आए जो बिना बुलाए घर महमान।
वह अजनबी सिर्फ़ महमान नहीं होता, जानों घर आया चल कर खुद भगवान्।
भगवान् का दर्जा दे कर उस को, मानों अपने ऊपर उस का बड़ा ऐहसान।
सेवा सत्कार करो दिल से उसका, उस पर कर दो सब कुछ कुर्बान।
सब से बड़ा महादान है यह होता, आतिथ्य में चाहे लुट जाए यह जान।
महमान की सेवा सब को नहीं मिलती, दुर्लभ अवसर यह नहीं मिलना आसान।
इसे हमेशा सौभाग्य समझो अपना, पाकर इसे भगवान् का दुर्लभ वरदान।
यही तो है सभ्यता संस्कृति हमारी, इसी से निरंतर बनती शान हमारी।
परिमल छोटा कभी महमान को न जानों, समझो साक्षात उसे भगवान्।।
नंदकिशोर परिमल, गांव व डा. गुलेर
तह. देहरा, जिला. कांगड़ा (हि_प्र)
पिन. 176033, संपर्क. 9418187358

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