जलती रही बस्ती

जलती रही बस्ती
देखता रहा मैं
आग की लपटों ने
कई घर जला दिये
कितना बेरहम हूं मैंं
एक भी बचा न सका
सब ओर धुआं ही धुआं था
सभी तो जल रहे थे
सब जुटे थे अपना अपना बचाने में
एसी नासमझी देखी नहीं पहले
सफल हो नहीं पाये
आग एक भी घर की बुझाने में।

सब ओर स्वार्थ था
मतलव था
चीखें थीं
शोर था
दर्द था
और भड़कती आग थी
आग के शोले थे
राख का ढेर था
चीखो पुकार थी
पानी की गाड़ियां थीं
एम्बूलैंस के सायरन थे।

कुछ लाशें थीं
कुछ घायल थे
आँखों मे आँसू थे
बुझती हुई आस थी
दिल में टीस थी
अनबुझ प्यास थी।
जली हुई बस्ती थी
आग का दरिया था
आहों का समन्दर था

सुरेश भारद्वाज निराश:evil:
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
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