गोश्त के लिए बकरे/सुशील भारती

नमस्कार दोस्तो… प्रस्तुत है पुराने दर्द के साथ एक नई रचना…

गोश्त के लिए बकरे को पाला गया
पंछी को पिंजरे में फंसाने के लिए,

दाना जाल में डाला गया।

गोश्त के लिए ही यारो,

इस बकरे को पाला गया।
उठे न अंगुलियाँ उस पर कभी,

तभी कीचड़ मुझ पर उछाला गया।

अल्फत की हाँडी दिखाकर,

नफरत की लौ में उबाला गया।

गोश्त के लिए ही यारो,

इस बकरे को पाला गया।
अपनी सफाई में कुछ ब्याँ न कर सका,

मेरे हर लफ्ज़ को वहाँ टाला गया।

नोचकर मेरी बोटी-बोटी,

इलज़ाम का सबूत खंगाला गया।

गोश्त के लिए ही यारो,

इस बकरे को पाला गया।
ज़माना भी कहाँ समझा दिल की तड़पन,

वहाँ से भी मेरी बेवाफाई का हवाला गया।

रखकर मन में घिनौनी साज़िश,

दिल- ए- दरबार से मुझे निकाला गया।

गोश्त के लिए ही यारो,

इस बकरे को पाला गया।
रोते हुए निकले अल्फाज़ दिल से,

रात ही नहीं मेरा हर दिन काला गया।

ज़माने की फिक्र क्यों करता है ‘भारती’?

तुझसे तो अपना दर्द भी न संभाला गया।

गोश्त के लिए ही यारो,

इस बकरे को पाला गया।
रचनाकार– सुशील भारती, नित्थर, कुल्लू (हि.प्र.)

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