सत्ता का नशा (कविता)

सत्ता का नशा है बड़ा भयानक।
मरते मरते नेता उठ पड़े अचानक।
सत्ता में नहीं होता कोई अपना बेगाना।
ऐसा ही है सत्ता का खेल बड़ा पुराना।
सत्ता में नहीं होता बाप बड़ा नहीं भैय्या।
सब से बड़ा सत्ता में होता है सिर्फ रुपैया।
सत्ता वेटे को अपने बाप से दूर भगाए।
बाप को भी वेटे की न फिर याद सताए।
भैय्या सुन लो, सत्ता का नशा बहुत बुरा है।
जो बेशर्म है पूरा, वही सत्ता में आज खड़ा है।
भले मानुष का खेल नहीं है यह सत्ता।
परिमल कहे यही इक सच्चाई है अलवत्ता।।
नंदकिशोर परिमल, गांव व डा. गुलेर
तह. देहरा, जिला. कांगड़ा (हि_प्र)
पिन. 176033, संपर्क. 9418187358