वक़्त /डॉ राधिका गुलेरी भारद्वाज

वक़्त

  है जो साक्षी प्रत्येक कृत्य का

गवाह भूत का, वर्त का, भविष्य का

न ले विश्राम, इक क्षण न सुप्त

यह वक़्त ! यह वक़्त ! यह वक़्त !
आज तेरा है कल होगा मेरा – यह वक़्त !

समंदर को कर देता सहरा – यह वक़्त !

जिसने समझा इसे उसको प्यारा – यह वक़्त !

है जीवन उसी का संवारा – यह वक़्त !
आसमां की बुलंदी को छू लो अगर

न करना ग़रूर ख़ुद पे इतना मगर

न देगा संभलने का मौका तुम्हें

उड़ते परिंदे को ज़मीं पे गिराता – यह वक़्त !
जो डूबे हुए हैं नशे में अहम् के

है दर उनका भी खटखटाता – यह वक़्त !

जो सुनकर  भी करदें अनसुना सा इसे 

मैं क्या हूं उन्हें तब बताता – यह वक़्त !
मौसमों से है मिलता कुछ इसका मिजाज़ 

कब कहाँ एक जगह ठहरा – यह वक़्त !

रंग इन्सान में भी रह बदलता है यह 

कभी तन्हा कभी साथ चलता – यह वक़्त !
बालपन में है कितना खुशहाल सा

लंबा हो ग़र लगे फिर भी छोटा – यह वक़्त !

यौवन में आ थोड़ा इठलाता है

चाहकर भी न तब मिल पाता – यह वक़्त !

बुढ़ापे में आ जो एकाकी हुआ

काटे भी न कट पाता – यह वक़्त !
नाउम्मीदी के अंधेरों में जो छुप से गए

उनका भी एक रोज़ आता है वक़्त

पल में हर ग़म को उनके धूमिल करे

फ़क़ीर से शहंशाह बनाता – यह वक़्त !
भूल कर न समझना ख़ुद को इससे बड़ा

न गूंगा है और है न बहरा – यह वक़्त !

वक़्त की मार दोस्तो है बुरी

बिगड़े बहुत ही रुलाता – यह वक़्त !
जो दे वक़्त तुमको अपना, कद्र उसकी करो

रूह से उसकी हर बात सजदा करो

जो बीता तो न मुड़ के आता है यह

मीठी यादें ही बन रह जाता – यह वक़्त !

मीठी यादें ही बन रह जाता – यह वक़्त !
डॉ राधिका गुलेरी भारद्वाज 

१२.११.२०१७ (कुवैत)

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