दिलो के दर्द का कोई सहारा क्यों नहीं होता
भरी दुनिया में कोई भी हमारा क्यों नहीं होता

तड़फती आरजू भी दे रही रो रो सदाएँ अब
निगाहों में मेरी कोई नजारा क्यों नहीं होता

मुहब्बत उम्र भर यूँ कसमसाती ही रही दिल में
मुहब्बत का मेरी कोई किनारा क्यों नहीं होता

भटकता ही रहा हूँ अंधेरो में अर्से से हम दम
दिखादे राहें मंजिल जो सितारा क्यों नहीं होता

नहीं है जब लिखी मेरे नसीबो में मुहब्बत फिर
मुहब्बत के बिना मेरा गुजारा क्यों नहीं होता

बसा है दिल में मेरे इस कदर हुस्नो जमाले जो
निगाहों से मेरी उसका उतारा क्यों नहीं होता
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
22/5/2017