घरौदा

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क्षितिज से दूर 

एक पंछी का घोसला

टूट रहा था,,
हूजूम के हूजूम थे वहाँ,,

पर 

सिर्फ द़रख्त ही 

अकेला सूख रहा था,,
कुछ सुखे पत्ते भी

साथ थोड़ा 

जरूर फड़ फड़ाए,,

पर 

आखिर में

सभी कुछ 

छूट रहा था
था तो सिर्फ एक चुभन 

एक कसक

कुछ यादें 

वो उम्मीदे

जो घरौंदा 

बनाते ही 

रूठ रहा था,,
काश कोई आए

कहे 

ये ख्वाब है आवेग

जो देखा वो

सब झूठ रहा था।।
आवेग जायसवाल

958 मुठ्ठीगंज

इलाहाबाद