(मत कर मेरी तेरी)
मत कर मानव मेरी तेरी, माया ने है बुध्दि फेरी।
दो पल का है जीवन सब का, क्यों करता फिर मेरी तेरी।
जो बोला वह याद है रहता, अच्छा मिटते लगे न देरी।
भूल जा अब तूं मेरी तेरी, अक्ल क्यों गई है मारी तेरी।
जग झूठा यह माया झूठी, न किसी की चले यहां तेरी मेरी।
रब का खेल बनाया सारा, उसी की बजती यहां रणभेरी।
इसी जन्म में मिल कर बिछुड़े, कौन करेगा फिर तेरी मेरी।
पल दो पल का मिलन हमारा, रब न मानें किसी की हेराफेरी।
सब में इक सम राम बसा है, उसके दम पर यह संसार चला है।
उसी को नतमस्तक हो तूं, छोड़ दे करना अब तूं यह मेरी तेरी।
जो होनी है हो कर रहती, तेरे मेरे बस की कोई बात नहीं है।
उसका खेल है जग में न्यारा, फिर तूं क्यों करता मेरी तेरी।
जीवन यात्रा पूरी कर के, मानव जब अनन्त लोक को चलता।
रह जाता यहीं पर सब कुछ, सब कुछ मिटते लगती नहीं है देरी।
छोड़ के माया जाल का धन्धा, चलता जा तूं हर हर करता।
परिमल जीवन की सच्चाई समझ कर, छोड़ दे करना यह तेरी मेरी।।
नंदकिशोर परिमल, गांव व डा. गुलेर
तह. देहरा, जिला. कांगड़ा (हि_प्र)
पिन. 176033, संपर्क. 9418187358