क्या राज़ है कुछ भी/नवीन शर्मा

बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212 2212
क्या राज़ है कुछ भी समझ आया नहीं।

आवाज़ सुन मैं बेवफ़ा धाया नहीं।।
इक वक्त था जब हम-निवाला आप थे।

इक कौर अब मैंने दिया खाया नहीं।।
डसने लगे हैं महफ़िलों के कहकहे  !

गुज़रा वग़ल से देख मुस्काया नहीं।।
क्या बात है कुछ तो बता ए संगदिल।

किसने दुखाया बोल क्या भाया नहीं।।
मेले जमाने में सदा लगते रहे।

खेला कभी तेरा समझ आया नहीं।।
सब जान कर अंजान थे बनते रहे।

हूँ नासमझ समझा तुझे पाया नहीं।।
जब नेमतें थीं बरसती जोर से।

आधा भरा भांडा भी छलकाया नहीं।।
मुझको मिले मंज़िल नहीं तो मौत दे।

खुद से कभी खुद को जो मिलवाया नहीं।।
रहते सभी के पास मुझसे दूर हो।

दामन बचाया याद तक आया नहीं।।
‘नवीन’ होने की बुरी क्या आरज़ू।

जिसने बनाया उसके घर  आया नहीं।।
नवीन शर्मा

गुलेर

९७८०९५८७४३

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