राजनेताओं की मौज/ नंद किशोर परिमल

राजनेताओं की मौज)
भारत में राजनेताओं की मौज है भारी।
जनता रोए यहां बुरी तरह घुट घुट बेचारी।
एक बार चुनाव जो जीतें, उम्र भर मौज ये खूब मनाएँ।
साम दाम दंड भेद से चुनाव जीत कर,सात पीढ़ियां इनकी तरती जाएं।
बाहुबली जेलों के भीतर से चुनाव यहां लड़ते।
रिश्वत दे दे कर लोगों की जेबें खूब हैं ये भरते।
चुनाव जीत कर जब ये बाहर आते, पूरा अपना हिसाब ये करते।
जनता ही उनको चुन कर लाती, बाद में बुरी तरह है ये पछताती।
उम्र चाहे सौ बरस की हो जाए, ब्हील चेयर से इनकी यारी।
गौ माता का चारा ये खाएँ, अक्ल गई है इनकी सब मारी।
निर्लज्ज हो कर निरपराध बताएं, न्यायालय इन को जेल भिजवाएं।
अपनी डफली अपना राग है इनका, किसी कर्म से न ये शर्माएं।
अंतकाल तक कुर्सी की इच्छा, नहीं छूटती है यह इनकी लाचारी।
परवाह इन्हें नहीं है समाज शर्म की, जनता भाड़ में जाए बेचारी।
योग्यता राजनेताओं की ढ़ीठाई से ही यहाँ है जानी जाती।
जितना ढ़ीठ नेता यहां पर, उतनी ही उसकी सफलता है आंकी जाती।
अच्छे भले मानुस का राजनीति में यहां कोई काम नहीं है।
जनता भी नहीं चुनती उसको, न जानूं क्या है उसकी लाचारी।
देश भक्ति का पाठ तो कोई इनसे सीखे, बगल में छुरी, मुंह से राम राम ये गाएं।
ऊपर से भगवां सफेदपोश ये सारे, अंदर से स्याह अति काले पूरी तरह ये परखे जाएं।
झूठे लारे लप्पे जनता को देते, खुद माल पूआ ये खूब उड़ाएं।
जनता के धन को अपनी जागीर समझ कर, हरदम अपने ऊपर खूब लुटाएं।
एक बार सिर्फ चुनाव जीतने तक, जनता के पीछे दौड़ें ये सब दल बारी बारी।
चुनाव जीतते ही ये बन जाते राजा, भिखमंगी जनता दौड़े इनके पीछे मारी मारी।
समय के साथ अब शासन प्रणाली बदलो, नहीं चलेगी यह पुरानी प्रणाली।
जनता ने सब जान लिया है, पाना चाहती है इससे छुटकारा बेचारी।
जनता जो चाहे परिवर्तन करदे, बुद्धि जनता की नहीं गई है मारी।
अंग्रेजों को बापिस भिजवा कर, शक्ति उसने दिखला दी थी अपनी सारी।
कब तक यह सहती रहेगी ये सब जनता, अब बतला देगी बात ये सारी।
परिमल कहता जनता से अब उठो और जागो, तुम्हारी है क्या अब लाचारी!
भारत में राजनेताओं की मौज है भारी।
जनता रोए यहां बुरी तरह घुट घुट कर बेचारी।
नंदकिशोर परिमल, गांव व डा. गुलेर
तह. देहरा, जिला. कांगड़ा (हि_प्र)
पिन. 176033, संपर्क. 9418187358

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