बे रुखी तो बस जमाने के लिये है
आबरू अपनी बचाने के लिये है

मोहब्बत का दर्द जो हमको मिला है
वो जमाने से छुपाने के लिये है

कर न तू शकओ शुबा मुझपे ऐ यारा
जाँ मुहब्बत में लुटाने के लिये है

मेरे बहते हुए अश्को पे न जा तुम
अश्क जख्मो को सुखाने के लिये है

जो लिखे अशआर हमने तेरे खातिर
दर्द – ए – दिल को मिटाने के लिये है

है लहू रंगे हिना में ज़ख्मे दिल का
तेरे हाथो में सजाने के लिये है
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
21/8/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )