काटे अब कटती नहीं है ज़िन्दगी
धूप जैसी हो गई है हर खुशी

इस कदर है खाई हमने ठोकरे
साजिशें ही तुमने कुछ ऐसी रची

मान बैठा हूँ खुदा अपना तुम्हे
बिन खुदा कैसे करूँ मै बन्दगी

कुछ नया बाकी नहीं मुझ मे रहा
कोशिशें भी करके देख ली आखरी

दर्द कोई बाँट ले जो मेरे भी
वो मिली ही ना किसी में आशिकी

साथ मेरे दो कदम चल ना सका
चाहते देख के जिसे दिल में जगी
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
8/6/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )