ग़ज़ल

कोई अपना ही दुश्मन हो जाये तो क्या कीजै
धडंकन साँसों में अगर खो जाय तो क्या कीजै।

जिन्दगी अज़ीब है मुश्किल से समझ आती है
अनहोनी मगर कोई हो जाये तो क्या कीजै।

सपने सच न भी हों तो क्या फर्क पड़ता है
हम जागे रहें कोई और सो जाय तो क्या कीजै।

दर्द बढ़ने लगे रूह तड़पने लगे कोई क्या करे
जख्म रिसने लगे नासूर हो जाये तो क्या कीजै।

कुदरत विफर जाय और फटने लगें जो बादल
एक साथ कई गाँवों को धो जाये तो क्या कीजै।

हम चलते बनैं जहाँ से किसी को फर्क न पड़े
कोई बावली शमशान में रो जाये तो क्या कीजै।

वैसे तो हमने किसी को शिद्दत से चाहा नहीं
कोई ख्यालों में ही अपना हो जाये तो क्या कीजै।

देकर दर्द बिछोड़े का चला जाये कोई जिन्दगी से
निराश हार यादों के गर पिरो जाये तो क्या कीजै।

सुरेश भारद्वाज निराश
धौलाधार कलोनी, लोअर बड़ोल
पी.ओ. दाड़ी धर्मशाला हि.प्र.
पिन 176057
9805385225
9418823654