जिंदगी क्या है?
कैसे बयां करुँ,
जिंदगी को बयां करती,
हिमालय से निकलती नदी का बखान करुँ,
पहाड़ से चलती,
राहों में नालों झरनों से मिलती,
नदी का रुप धारण करती,
पत्थरों को बहाती ,
हर बाधा को रौंदती,
बस चलती जाती,
समुद्र में मिल कर मर जाती,
कुछ ऐसी तान यह जिंदगी सुनाती,
हर पल शमशान की ओर बढती।

वीपी ठाकुर,
कुल्लू