कोई जा रहा है कोई नि:स्वार्थआ रहा है,
दिल खोल कर कोई नहीं बात बता रहा है।।

नेता वोटर दोनों असमझस में हैं आज,
क्युँ कोई आता क्युँ कोई छोड़ जा रहा है।।

चौरा़ह हाट में सन्नाटा पस़रा है क्युं इतना,
झण्ड़ा किसी का डण्ड़ा किसी लगा रहा है।।

जिसकी सुनता नहीं कोई कहीं बात तक,
हिसा़व वोटऱों का वो़ह भी बैठ समझा रहा है।।

नशे में धुत गली गली पड़ता रहा जो,
झण्डा पार्टी का घर पर ऊंचा लगा रहा है।।

यह चुप्पी टुटेगी या वोटर बदल गया है,
वोटर भी अनुमान नहीं आज लगा पा रहा है।।

मीटिंग में वोटर नहीं भीड़ इक़ट्ठी हो जाये,
खुश हो नेता कोई ऐसी तरकी़व लगा रहा है।।

इन सब से बाहर भी है कोई अनजान, जग्गू,
वोट देने जरूर जाना घर घर जा समझा रहा है।।