बदलते वक्त की इक दास्ताँ/हेमन्त पांडेय

बदलते वक्त की इक दास्ताँ सुना रहा हूँ
समाज और संस्कृति की इक छवि दिखा रहा हूँ
हैरान हूँ खुद मैं हैरानी की इक बात बता रहा हूँ
रोशनी है पूरे शहर में अंधेरों से मुलाकात करा रहा हूँ |

बदलते वक्त की इक दास्ताँ सुना रहा हूँ
मैं कभी मुस्कुरा तो कभी गुनगुना रहा हूँ
कुछ दर्द सीने के अपने आप सबको बता रहा हूँ
मैं दर्द की बातों को अपनी कविता में संजों रहा हूँ
चिराग तले अँधेरे कहावत की मैं सच्चाई बयां कर रहा हूँ |

बदलते वक्त की इक दास्ताँ सुना रहा हूँ
मैं अपने देश के हर सामाजिक मुद्दे से अवगत करा रहा हूँ
मैं आम नागरिक हूँ इसलिए बातें कुछ खास कर रहा हूँ
मैं राजनीति को राष्ट्रनीति नहीं स्वीकार कर रहा हूँ
सच यही है , मैं सूरज हूँ उम्मीदों का झूठी सियासत से सिर्फ पर्दा उठा रहा हूँ |

बदलते वक्त की इक दास्ताँ सुना रहा हूँ |
धर्म की आड़ में हो रहे अधर्म की बातें बता रहा हूँ
जिन मूर्खो को मानवता मालूम नहीं उन्हें इंसानियत का हमदर्द पा रहा हूँ
उससे भी बड़ा दुःख है जो समझदार लोगों को मूर्खों की आवभगत करते देख रहा हूँ
सच यही है चिराग तले अँधेरा है फिर भी लोगों को गुमराह होते पा रहा हूँ |

बदलते वक्त की इक दास्ताँ सुना रहा हूँ |
दर्द है सीने में मगर मुस्कुरायें जा रहा हूँ
शिक्षा की ये हालत है बिन पढ़े लिखे को ही अब मास्टर पा रहा हूँ
जिन्हें हिंदी संस्कृत मालूम नहीं उन्हीं को मुफ्त में पचास हजार वेतन उठाते देख रहा हूँ
देश में है दलाली नीचे से लेकर ऊपर तक इस कदर ,
सौ में नब्बे परसेंट को भ्र्ष्टाचार से घिरा पा रहा हूँ |

बदले वक्त की इक दास्ताँ सुना रहा हूँ |
सरकारी योजनाओं को मैं सरकारी ही बता रहा हूँ￰
सरकारी योजनााओं को फाइलों में ही पड़ी पा रहा हूँ
सरकार गहरी नींद में सो रही है और मैं कविता सुना कर जनता को जगा रहा हूँ
ये वोट के भिखारी सिर्फ नोट जानते हैें मैं तो इनकी पुरानी फितरत बता रहा हूँ |

मैं कवि ( हेमन्त ) बदलते वक्त की इक दास्ताँ सुना रहा हूँ |
मानवता ही मानव का धर्म है ये हकीकत बता रहा हूँ
जिंदगी जीने के अपने अपने नियम को धर्म कह रहा हूँ
परोपकार से भरे ह्रदय को ही मैं इंसान कह रहा हूँ |
बदलते वक्त की इक दास्ताँ सुना रहा हूँ ||

कवि – हेमन्त कुमार पाण्डेय ( अमेठी )
‎ 9082747967

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