आज फिर इश्क के शोलों को हवा दी जाये
बज्म में नज्म मुहब्बत की सुना दी जाये

दिल शरारत पे उत्तर कर आ गया है मेरा
फिर गिरा जुल्फ को चहरे पे सजा दी जाये

रात ओ दिन के उजाले थे कभी जीवन में
मिल न पाई जो मुहब्बत में वफ़ा दी जाये

रूह के जख्म से फिर रिसने लगा खूँ मेरे
दिल-ऐ-जख्मो को दवा याके दुआ दी जाये

एक पत्थर को खुदा कहते रहे जीवन भर
दिल में तस्वीर बसी है जो हटा दी जाये

उठ रही दिल में उमंग फिर से मुहब्बत की
दिलमें उल्फत की जगीआग सुला दी जाये
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
3/6/2017
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )