व्यंग्य रचना/समाजबाद/बह घर, घर न रहा/सुरेश भारद्वाज निराश

व्यंग्य रचना

समाजबाद

बह घर, घर न रहा
जहां वसेरा हुआ करता था
बह दर, दर न रहा
जहां सवेरा हुआ करता था
अब तो रात भी आती है
ठीक चौराहे के बीच
बह फुटपाथ भी छिन गया
जो मेरा हुआ करता था
पर कोई रंज नहीं जनाव
शायद यही है समाजवाद।।

तुमने समाजवाद का नाम ही सुना है
मैं इसे अच्छी तरह से जानता हूँ
तुमने इसे देखा तक नहीं
मैं इसे पहचानता हूँ
यह समाजवाद ही तो है
जिस चौराहे पर पुलिस कांस्टेवल
डयूटी दिया करता है
मैं बहीं पर भीख मांगता हूँ
कुछ आया समझ में जनाव
शायद यही है समाजवाद।।

लोग कहते हैं देश में बहुत गरीवी है
जो एसा सोचते हैं यह उनकी बदनसीवी है
मेरे विचार में लोग
बड़े आराम से जीते है
खाने को भले ही रोटी न मिले
शराव रोज़ पीते हैं
माँग कर, लूट कर, कमाकर कैसे भी
मतलव तो पीने से है मिले जैसे भी
भट्टियाँ चल रही हैं सरकारी ठेके खुले है
सभी तो बर्वाद होने पर तुले हैं
सरकार भी मेहरवान है
ठेके, स्कूलों मंदिरो अस्पतालों की शान हैं
हमें भी नाली में पड़े रहने में आन्नद आता है
कमा कर खाना किसे सुहाता है
कोई रोकता नहीं कोई पूछता नहीं
सिवा शराव कुछ सूझता नहीं
इस जीने में है कितना स्वाद
शायद यही है समाजवाद।।

हमने सब लोगों को
गरीवी रेखा से उपर उठाना है
सबको समझाना है
इन्हें रोटी की आदत डालनी है
इनसे शराव छुड़वाना है
तभी सब जान पायेंगे
क्या होता है समाजवाद
हाथ पर धरी सूखी रोटी
या सतरंगी सलाद
चमचमाता बंगला और मोटर
या भूखा नंगा वोटर
बेरोजगार बेटे का बाप होना
या रोटी के लिये विलख विलख कर रोना
परिवार को देखना भूख से मरते हुए
या ज्वां बेटे को देखना चोरी करते हुए
वरसती हुई आँखें
या उखड़ी हुई साँसें
सूखी पत्तियों सी काया
जवानी पर मृत्यु की छाया
अथाह मजवूरियों का आभास
एक दर्दीला इतिहास
क्या यही है अच्छे दिनों का आगाज़
शायद यही है समाजवाद।।

वृद्ध माँ बाप वृद्धाश्रम की शरण में
फर्क क्या है जीवन और मरण में
संन्तान सुखी है हम यहीं सही
जो वो चाहते है हम भी चाहते हैं वही
पर कभी कभी दुख होता है
मन रोता है
काश! हम पितर हो जाते
श्राद्ध में तो याद आते
दुख होता है जब वह रोती है
आधी आधी रात तक नहीं सोती है
बेटा बेटी बहु पोता पोती को याद करती है
कहती नही पर रोती है आँख भरती है
यह कैसी है भीतरघाती याद
शायद यही है समाजवाद ।।

वोट आते है
हम मुस्कराते हैं
शराव मिलती है सींख मिलती है
हमारी रुह खिलती है
पीते हैं खाते है
फिर उसी के हो जाते है
उसके नाम का बटन दवाते है
उसे संसद में पहुँचाते है
फिर बह हमारा कोई काम नहीं करता
हमारी बात पर कान नहीं धरता
हम चिल्लाते है
अपने ही चुने हुए को गाली सुनाते है
जैसा हमारा चरित्र वैसा अंन्दाज
शायद यही है समाजवाद।।

कहीं घर नहीं कहीं मकान नहीं
कहीं रिज़क नही कहीं शमशान नहीं
रोग है दवाई नहीं
बुरे दिन हैं कमाई नहीं
भारत स्वच्छ है
पर सफाई नहीं
स्कूल हैं पर पढाई नही
कीमतें आसमान में
सुना महंगाई नह़ीं
मिलता काम-काज़ नही
अस्पताल हैं ईलाज़ नहीं
खत्म होता यह अध्याय नहीं
कचहरी हैं न्याय नहीं
सरकार हमने चुनी हमने बनाई
हम ही कहते हैं हमें नहीं भायी
संस्कारों का असर नहीं
कानून का डर नहीं
जैसा हमारा कल था वैसा ही आज है
जैसे हम हैं वैसा ही राज है
कोई बताये हम कहां जायें
किसे अपनी दुर्दशा बतायें
कब तक कचरे के ढेर पर गुजा़रा करेंगे
बीन बीन खायेंगे तिनका तिनका मरेंगे
हमारे लिये कुछ कर खुदा
यह है अंतिम फरियाद
शायद यही है समाजबाद !!!
शायद यही है समाजवाद !!!

सुरेश भारद्वाज निराश☺
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
पी ओ दाड़ी, थर्मशाला हिप्र
176057
9418823654
9805385225

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From: “suresh bhardwaj”
Date: Oct 25, 2017 10:31 AM
Subject: 34*
To: “suresh bhardwaj”
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व्यंग्य रचना

समाजबाद

बह घर, घर न रहा
जहां वसेरा हुआ करता था
बह दर, दर न रहा
जहां सवेरा हुआ करता था
अब तो रात भी आती है
ठीक चौराहे के बीच
बह फुटपाथ भी छिन गया
जो मेरा हुआ करता था
पर कोई रंज नहीं जनाव
शायद यही है समाजवाद।।

तुमने समाजवाद का नाम ही सुना है
मैं इसे अच्छी तरह से जानता हूँ
तुमने इसे देखा तक नहीं
मैं इसे पहचानता हूँ
यह समाजवाद ही तो है
जिस चौराहे पर पुलिस कांस्टेवल
डयूटी दिया करता है
मैं बहीं पर भीख मांगता हूँ
कुछ आया समझ में जनाव
शायद यही है समाजवाद।।

लोग कहते हैं देश में बहुत गरीवी है
जो एसा सोचते हैं यह उनकी बदनसीवी है
मेरे विचार में लोग
बड़े आराम से जीते है
खाने को भले ही रोटी न मिले
शराव रोज़ पीते हैं
माँग कर, लूट कर, कमाकर कैसे भी
मतलव तो पीने से है मिले जैसे भी
भट्टियाँ चल रही हैं सरकारी ठेके खुले है
सभी तो बर्वाद होने पर तुले हैं
सरकार भी मेहरवान है
ठेके, स्कूलों मंदिरो अस्पतालों की शान हैं
हमें भी नाली में पड़े रहने में आन्नद आता है
कमा कर खाना किसे सुहाता है
कोई रोकता नहीं कोई पूछता नहीं
सिवा शराव कुछ सूझता नहीं
इस जीने में है कितना स्वाद
शायद यही है समाजवाद।।

हमने सब लोगों को
गरीवी रेखा से उपर उठाना है
सबको समझाना है
इन्हें रोटी की आदत डालनी है
इनसे शराव छुड़वाना है
तभी सब जान पायेंगे
क्या होता है समाजवाद
हाथ पर धरी सूखी रोटी
या सतरंगी सलाद
चमचमाता बंगला और मोटर
या भूखा नंगा वोटर
बेरोजगार बेटे का बाप होना
या रोटी के लिये विलख विलख कर रोना
परिवार को देखना भूख से मरते हुए
या ज्वां बेटे को देखना चोरी करते हुए
वरसती हुई आँखें
या उखड़ी हुई साँसें
सूखी पत्तियों सी काया
जवानी पर मृत्यु की छाया
अथाह मजवूरियों का आभास
एक दर्दीला इतिहास
क्या यही है अच्छे दिनों का आगाज़
शायद यही है समाजवाद।।

वृद्ध माँ बाप वृद्धाश्रम की शरण में
फर्क क्या है जीवन और मरण में
संन्तान सुखी है हम यहीं सही
जो वो चाहते है हम भी चाहते हैं वही
पर कभी कभी दुख होता है
मन रोता है
काश! हम पितर हो जाते
श्राद्ध में तो याद आते
दुख होता है जब वह रोती है
आधी आधी रात तक नहीं सोती है
बेटा बेटी बहु पोता पोती को याद करती है
कहती नही पर रोती है आँख भरती है
यह कैसी है भीतरघाती याद
शायद यही है समाजवाद ।।

वोट आते है
हम मुस्कराते हैं
शराव मिलती है सींख मिलती है
हमारी रुह खिलती है
पीते हैं खाते है
फिर उसी के हो जाते है
उसके नाम का बटन दवाते है
उसे संसद में पहुँचाते है
फिर बह हमारा कोई काम नहीं करता
हमारी बात पर कान नहीं धरता
हम चिल्लाते है
अपने ही चुने हुए को गाली सुनाते है
जैसा हमारा चरित्र वैसा अंन्दाज
शायद यही है समाजवाद।।

कहीं घर नहीं कहीं मकान नहीं
कहीं रिज़क नही कहीं शमशान नहीं
रोग है दवाई नहीं
बुरे दिन हैं कमाई नहीं
भारत स्वच्छ है
पर सफाई नहीं
स्कूल हैं पर पढाई नही
कीमतें आसमान में
सुना महंगाई नह़ीं
मिलता काम-काज़ नही
अस्पताल हैं ईलाज़ नहीं
खत्म होता यह अध्याय नहीं
कचहरी हैं न्याय नहीं
सरकार हमने चुनी हमने बनाई
हम ही कहते हैं हमें नहीं भायी
संस्कारों का असर नहीं
कानून का डर नहीं
जैसा हमारा कल था वैसा ही आज है
जैसे हम हैं वैसा ही राज है
कोई बताये हम कहां जायें
किसे अपनी दुर्दशा बतायें
कब तक कचरे के ढेर पर गुजा़रा करेंगे
बीन बीन खायेंगे तिनका तिनका मरेंगे
हमारे लिये कुछ कर खुदा
यह है अंतिम फरियाद
शायद यही है समाजबाद !!!
शायद यही है समाजवाद !!!

सुरेश भारद्वाज निराश☺
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
पी ओ दाड़ी, थर्मशाला हिप्र
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