हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव (2017)को देखते हुए आप सभी लोगों के लिए एक कविता* :-

सियासत का खेल अजब गरमाया है
एक ने मार लात दूसरे ने गले लगाया है।

कुत्ते भी बेहतर होते राजनीति में गर आते
न बंटते इंसान गर भेड़िये सामने आते।

जेब और सहबा गर्म कर जाबिर बन गए वो
बिक गए वो भी दरवाजा बंद करके बैठे थे जो।

कमाई गरीब की लखपति बन बैठे हैं वो
सपनों में दिखाते अब आफताब वोट जो ले बैठे हैं वो।

जनता भोली भेड़ ऊन कटती रहेगी
वंशवाद, विकासवाद नारा है गुमराही का जनता सहती रहेगी।

जागो और चुनो जो जमीन से पैर न छोड़े
उड़ने वालों से भरा है जहां तुम्हें देख बाद में वो मुंह न मोड़े।
*दीपक भारद्वाज*