गोपालक हे बनवारी,रोती हैं गौएँ सारी।

हो कहाँ मेरे गिरधारी,तुम हर लो विपदा सारी।।
बहती है लोचन धारा, मझधार भँवर न किनारा।

दर दर की ठोकर खाती, गौ माँ ने तुम्हे पुकारा।।
गोपालक आज कहाँ हो,संचालक आज कहाँ हो।

सुन करुण वेदना मेरी,जगपालक आज कहाँ हो।।
तृण भी ना मिल पाता है, हम दूषित ग्रास निगलती।

है भटक भटक कर दर दर,ये काया मेरी जलती।।
हो कहाँ कृपा के सागर, हम बने आज जो नागर।

हमे ग्राम कुंज पहुँचाओ,आ जाओ अब करुणाकर।।
अब शीघ्र उबारो माधव,बेबस जीवन ये हमारा।

बंसी की तान सुना दो,कातर हो तुम्हे पुकारा।।

        Dr. Meena kumari