हे मानव!
अमावस की रात को,
तूने,
दीपों से रोशन किया,
मन में भी ,
एक,
दीप जलाना,
मानवता की,
जिसमें,
लौ जलाना,
बुझ जायेगा दीप दीवाली,
का,
मत बुझाना दीप मानवता की हरियाली का।
हे मानव!
तेरे दिल दीप में जलती मानवता की लौ,
ही,
रोशन करेगी दीवाली उनकी,
जिनकी,
दीवाली मनती है,
बिन मिठाई,
खुले आसमान के नीचे,
हे मानव!
तेरे दिल दीप में जलती,
मानवता की लौ,
ही,
लाएगी खुशाहली ,
उन खाली,
हाथों में।

वीपी ठाकुर,
कुल्लू।