मेरे पहाड़ में/अशोक दर्द

मेरे पहाड़ में



मेरे पहाड़ में उगते हैं आज भी प्रेम के फूल ,
और घासनियों पर उगती है सौहार्द की दूब ;
घाटियाँ गूंथती हैं छलछलाती
नदियों की मालाएं ;
धूडूबाबा की तरह नाचते झरने ,
गाते हैं रान्झु फुलमू ,कुंजू –चंचलो और सुन्नी –भून्कू के प्रेमगीत ,
यहाँ लोग दौड़ते नहीं ,
सिर्फ सीना ऊँचा कर चलते हैं ,
यहाँ आज भी घर ,
घर ही हैं ;
लोगों ने इन्हें मकानों में नहीं बदला है ;
मेरे पहाड़ में कोई लापता नहीं होता ,
दूर –दूर तक खबर रहती है उसके होने या न होने की ;
आज भी यहाँ कुछ अनछुए रास्ते हैं
जिन पर सिर्फ देवता ही विचरते हैं ,
किसान आज भी सज्जन –मित्र पछे-परौहने भिखु-भंगालु और
चिडुओं-पंखेरुओं के नाम
कुछ दाने अपने खेतों में ,
जरूर बीजते हैं
बूढ़ी ताई ने परंपराओं की पोटली आज भी संभाल कर रखी है ,
आ ज भी सत्यम-शिवम-सुन्दरम का वास है मेरे पहाड़ में …..||,

मैं पीड़ा हूँ

मैं पीड़ा हूँ उस खेत की
जो कभी बाढ़ में बह जाता है ,कभी सूखे में झुलस जाता है ,
और कभी –कभी भरपूर फसल के बावजूद भी ,उस पर रोटियां बीजने वाला ,कर्ज में डूबा ,भूखा ही लंबी नींद सो जाता है ;
मैं पीड़ा हूँ उन हाथों की ,
जो हमेशा छालों से भरे रहते हैं ,जिनकी पीढ़ियाँ मेहनत-मेहनत
लिखते-लिखते खप जाती हैं ;और हासिल-हासिल किसी और के हिस्से दर्ज हो जाता है ,
और वे हाथ रिसते छालों को चीथड़ों में ढककर उम्र गुजार देते हैं ;
मैं पीड़ा हूँ उस एकता की देवी की ,जो छटपटा-कराह-कुम्लाह
रही है ;जिसे कुछ स्वार्थी दानव फलता-फूलता नहीं देखना
चाहते ,इसलिए उसे काटने के लिए उन्होंने,
उस की जड़ों में ,धर्म-जाति-वर्ण-भाषा-क्षेत्रवाद के जहरीले चूहे
छोड़ दिए हैं ;
मैं पीड़ा हूँ उन सिसकियों की ,
जो बिस्तर पर मुहं में तकिया डाल,कमरे के अन्दर
ही घुट-घुट कर मर जाती हैं ;
मैं पीड़ा हूँ उन पंखों की ,जिन्हें उड़ान से पहले ही
काट दिया जाता है ,और जिनके हिस्से का आकाश ,
छीन लिया जाता है ,कभी मर्यादाओं का वास्ता देकर
कभी फ़र्जों का वास्ता देकर ;
मैं पीड़ा हूँ उस सूरज की ,जो चमकना तो चाहता है ,
परन्तु …,उस के आस-पास फैले भ्रष्टाचार के बादल
उसकी धूप की चमक को धरती को छूने नहीं देते ,
मैं पीड़ा हूँ उन अनाम चीखों की ,जिन्हें किसी नाम से
संबोधित नहीं किया जा सकता ,और
भेड़ियों भरे जंगल में जिन्हें सुनकर ,
हमेशा अनसुना कर दिया जाता है ,
और यदि कोई सुन भी ले तो ,उन चीखों पर रोया नहीं जाता ,
उन्हें चुप नहीं कराया जाता ,सिर्फ
ठहाके लगाये जाते हैं और तालियाँ पीटी जाती हैं ,
मैं पीड़ा हूँ …,बेबस पीड़ा ..||

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