इन लबो से ये गुम/लक्ष्मण दावानी

इन लबो से ये गुम हँसी क्यूँ है
दिल में तेरे ये खलबली क्यूँ है

रातें गर करवटों में बीती है
चहरे पर फिर ये ताजगी क्यूँ है

करते थे जो बात जफ़ाओं की
उनके आँखों में ये नमी क्यूँ है

कर न बदनाम महफ़िलो में यूँ
नफ़रतें दिल में ये बसी क्यूँ है

करते हो बातें प्यार की हमसे
फिर रकीबो से दिल्लगी क्यूँ है

झाँक कर देख दिल में अपने भी
दिल में हलचल तिरे मची क्यूँ है

तुम्हे नफरत है गर उजालो से
इन चिरागो में रौशनी क्यूँ है
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )

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