चमक उठे दीवाली के दिये/रीता सिंह रितु

चमक उठे दीवाली के दिये

चारो ओर
नहीं पा रहा जगह अंधेरा
किसी भी ओर
कुछ इस तरह मनाये
अबकी दीवाली का त्यौहार
सत्य अहिंसा प्रेम का
बड़े जिस से व्यापार
अबके अमावस में फैले
चहु दिशा यूँ उजियार
मिट जाए हरि कृपा से
मन का भी अंधियार
गूंज रहे पटाखे
धूम धड़ाक धूम धड़ाम
लक्ष्मी और गणेश को
सत सत मेरा प्रणाम
राम अयोध्या लौटकर
आये थे इस शाम
युगों युगों से जल रहा
दीप यह अविराम

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