संग गैरो के मिलकर रुलाने लगे
रंग अपना असल वो दिखाने लगे

जुस्तजू इश्क की मेहमाँ बन गई
कर्ज हम किश्तों में चुकाने लगे

कैसे उनको बताते हमें इश्क है
नजरे जब हमसे ही वो चराने लगे

रंग में उनके मैं रंग जाऊँ ऐसा
प्यार झूठा मुझे भी सिखाने लगे

उनके ख्याल में खोये रहते है हम
हाल देखकर मिरा मुस्कराने लगे

मुहब्बत खेल है उनके लिये यहाँ
दाँव पर दिल लगाकर हराने लगे
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
आई – 11 पंचशील नगर
नर्मदा रोड़ ( जबलपुर म,प्र, )